आज के भागदौड़ भरे डिजिटल युग में जहाँ रिश्तों की परिभाषा ‘लाइक’ और ‘कमेंट’ तक सिमटती जा रही है, वहाँ प्रेम का ‘बुखार’ होना एक सुखद संकेत है कि मानवीय संवेदनाएँ अभी जीवित हैं। प्रेम केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि एक ऐसा मानसिक और आध्यात्मिक रूपांतरण है जो इंसान के सोचने-समझने का नज़रिया बदल देता है।
डिजिटल दौर और प्रेम की दस्तक
पुराने समय में प्रेम पत्रों के इंतज़ार में हफ़्तों बीत जाते थे, लेकिन आज यह ‘इंस्टेंट मैसेजिंग’ और ‘वीडियो कॉल’ के युग में प्रवेश कर चुका है। जैसा कि चर्चा की गई, आज “व्हाट्सऐप के डबल टिक” दिल की धड़कनें तय करते हैं। तकनीक ने भले ही संवाद की दूरी कम कर दी हो, लेकिन प्रेम का मूल तत्व—वह बेचैनी और वह समर्पण—आज भी वैसा ही है जैसा सदियों पहले था।
चुनौतियाँ और अस्तित्व
समाज हमेशा से प्रेम के प्रति सशंकित रहा है। परंपराओं और आधुनिकता के बीच का संघर्ष प्रेम को अक्सर एक कठिन परीक्षा में डाल देता है। मगर इतिहास गवाह है कि जो प्रेम साहस और धैर्य के साथ इन दीवारों को पार करता है, वही व्यक्तित्व का निर्माण करता है। प्रेम व्यक्ति को केवल भावुक नहीं बनाता, बल्कि उसे उत्तरदायी और साहसी भी बनाता है।
रचनात्मकता का आधार
प्रेम की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सृजनात्मकता है। एक प्रेमी हृदय ही बेहतरीन कविताएँ, संगीत और कला को जन्म दे सकता है। यह वह ऊर्जा है जो शून्य में भी रंग भर देती है। जब यह एहसास गहरा होता है, तो व्यक्ति स्वयं से ऊपर उठकर दूसरे की खुशी में अपनी सार्थकता ढूँढने लगता है।
निष्कर्ष
प्रेम को ‘बुखार’ कहना इसे एक जीवंत प्रक्रिया मानना है। यह कोई बीमारी नहीं, बल्कि जीवन के प्रति एक गहरा अनुराग है। यदि प्रेम आपको संवेदनशील, ईमानदार और दूसरों के प्रति दयालु बना रहा है, तो यह बुखार पूरी तरह से सकारात्मक है। ज़रूरत सिर्फ इस बात की है कि हम इसे मर्यादा, सच्चाई और आपसी सम्मान के साथ सींचें।
अंततः, प्रेम ही वह धागा है जो इस बिखरती हुई दुनिया को एक सूत्र में पिरोए रख सकता है।
