प्रयागराज/लखनऊ: इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी को बड़ी राहत दी है। अदालत ने उनके खिलाफ कथित दोहरी नागरिकता के मामले में प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने के अपने ही पिछले आदेश पर शनिवार को अंतरिम रोक लगा दी।
अदालत की महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी आरोपी के खिलाफ उसका पक्ष सुने बिना निर्णय लेना न्यायोचित नहीं है। अदालत ने ‘प्राकृतिक न्याय’ के सिद्धांत का हवाला देते हुए माना कि इस स्तर पर राहुल गांधी की बात सुनना भी आवश्यक है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला राहुल गांधी की नागरिकता को लेकर लगे आरोपों से जुड़ा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार:
- आरोप: याचिकाकर्ता का दावा है कि वर्ष 2003 में इंग्लैंड में एक कंपनी के पंजीकरण के दौरान राहुल गांधी ने कथित तौर पर अपनी ब्रिटिश नागरिकता की जानकारी छिपाई थी।
- पूर्व आदेश: शुक्रवार को हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस को इस मामले में FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था।
- निचली अदालत का फैसला: हाईकोर्ट ने लखनऊ की विशेष सांसद/विधायक (MP/MLA) अदालत के 28 जनवरी 2025 के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें राहुल गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया गया था।
जांच और सुनवाई की स्थिति
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से उप सॉलिसिटर जनरल एस.बी. पांडे ने नागरिकता से संबंधित रिकॉर्ड अदालत के समक्ष रखे। वहीं, राज्य सरकार के अधिवक्ता ने भी स्वीकार किया कि आरोपों की प्रारंभिक जांच जरूरी है।
हाईकोर्ट ने पहले टिप्पणी की थी कि निचली अदालत यह परखने में विफल रही कि क्या मामले में प्रथम दृष्टया कोई संज्ञेय अपराध बनता है।
आगे क्या?
हाईकोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद अब राहुल गांधी के खिलाफ फिलहाल कोई पुलिस कार्रवाई या एफआईआर दर्ज नहीं होगी। मामले की अगली सुनवाई तक सभी प्रक्रियाओं पर रोक लगा दी गई है। अदालत अब दोनों पक्षों की विस्तृत दलीलें सुनने के बाद ही भविष्य की दिशा तय करेगी।
