बाराबंकी। जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया (रजि.) के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. अनुराग सक्सेना ने पत्रकारिता की वर्तमान स्थिति और इसके सामने खड़ी चुनौतियों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। बाराबंकी में आयोजित एक संगोष्ठी को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि निष्पक्ष समाचारों के बिना समाज सही निर्णय लेने की क्षमता खो देगा, जो लोकतंत्र के लिए एक गंभीर संकेत है।
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ दबाव में: डॉ. अनुराग सक्सेना
डॉ. अनुराग सक्सेना ने कहा कि लोकतंत्र में पत्रकारिता को राष्ट्र का चौथा स्तंभ माना गया है, लेकिन आज के दौर में यह क्षेत्र भारी चुनौतियों और दबावों से घिर गया है। वर्तमान परिस्थितियों पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि आज बहुत कम पत्रकार और मीडिया संस्थान ऐसे बचे हैं, जो अपने मूल दायित्वों का पूरी निष्पक्षता और निर्भीकता के साथ निर्वहन कर पा रहे हैं।
पत्रकारिता के मार्ग में आने वाली मुख्य बाधाएं
संगोष्ठी के दौरान उन्होंने उन प्रमुख कारणों पर भी प्रकाश डाला जो आज पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित कर रहे हैं:
- राजनीतिक और संस्थागत दबाव: पत्रकार लगातार कई तरह के व्यक्तिगत और व्यवस्थागत दबावों का सामना कर रहे हैं।
- आर्थिक निर्भरता: विज्ञापनों की मजबूरी और वित्तीय निर्भरता के कारण निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
- सुरक्षा का संकट: मुकदमों, धमकियों और असुरक्षित माहौल के बीच पत्रकारों को काम करना पड़ रहा है, जिससे कई बार लोग समझौता करने को विवश हो जाते हैं।
समाज और लोकतंत्र के लिए बड़ा संकट
”पत्रकारिता का संकट केवल मीडिया जगत का संकट नहीं है, बल्कि यह पूरे लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चुनौती है।” – डॉ. अनुराग सक्सेना
उन्होंने आगे कहा कि पत्रकारिता का मूल उद्देश्य जनता और शासन-प्रशासन के बीच एक मजबूत सेतु का कार्य करना है। यदि जनहित के मुद्दे ही पीछे छूट जाएंगे, तो मीडिया अपनी प्रासंगिकता खो देगा। विपरीत और कठिन परिस्थितियों के बावजूद जो पत्रकार आज भी जनहितकारी पत्रकारिता को जीवित रखे हुए हैं, वे सराहना के पात्र हैं।
मूल मूल्यों को पुनः स्थापित करने की मांग
जर्नलिस्ट काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष ने सत्य, निष्पक्षता, साहस और जनहित जैसे पत्रकारिता के मूल मूल्यों को फिर से स्थापित करने की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने मांग की कि पत्रकारों को एक सुरक्षित और स्वतंत्र वातावरण मिलना चाहिए ताकि वे बिना किसी भय या प्रलोभन के अपने कर्तव्यों का पालन कर सकें। उन्होंने अंत में दोहराया कि राष्ट्र का चौथा स्तंभ तभी मजबूत रह सकता है, जब उसकी नींव पूरी तरह सत्य और स्वतंत्रता पर टिकी हो।
