लखनऊ । हाल ही में एक घटना ने पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह घटना तब घटी जब महिला पत्रकार ज्योति श्रीवास्तव को एक स्थानीय मामले की रिपोर्टिंग के दौरान बेरहमी से पीटा गया। यह न केवल एक व्यक्तिगत आक्रमण है, बल्कि यह उस व्यापक सामाजिक मुद्दे का भी प्रतीक है, जहां महिला पत्रकारों को उनके पेशेवर कर्तव्यों के दौरान असुरक्षा का सामना करना पड़ता है।
ज्योति श्रीवास्तव एक स्थापित पत्रकार हैं, जो स्थानीय मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। अपने कार्य में वह सत्यता और निष्पक्षता को बनाए रखने का प्रयास करती हैं। लेकिन वे लगातार ऐसे खतरों का सामना कर रही थीं, जो उनकी निष्पक्ष रिपोर्टिंग को चुनौती देता है। इस घटना ने न केवल उनके व्यक्तिगत जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि यह सभी महिलाओं के लिए एक खतरे के रूप में दिखता है, जो पत्रकारिता के क्षेत्र में काम कर रही हैं।
इस तरह की घटनाएं यह इंगित करती हैं कि महिला पत्रकारों को अपने पेशे में बिना किसी डर के काम करने का अवसर नहीं मिल रहा है। सुरक्षा के अभाव के कारण, महिलाएं अपने काम को सुचारु रूप से नहीं कर पा रही हैं। इस दौरान राज्य और स्थानीय पुलिस की लापरवाही भी सामने आई है, जिसने इस विषय को और गंभीर बना दिया है। जब पत्रकारिता में सुरक्षा और स्वतंत्रता को लेकर हमारे समाज की धारा इस प्रकार प्रभावित होती है, तो यह एक बड़ी चिंता का विषय है।
घटना का विवरण
8 नवम्बर 2025 को लखनऊ में एक महिला पत्रकार के साथ हुई घटना ने न केवल स्थानीय मीडिया को बल्कि व्यापक समुदाय को भी हिला कर रख दिया। महिला पत्रकार ने एक विस्तृत तहरीर दर्ज कराई, जिसमें उन्होंने कई गंभीर आरोप लगाए। उनके अनुसार, एक समूह ने उन्हें जबरदस्ती बंधक बना लिया और इसके बाद उनके साथ शारीरिक उत्पीड़न किया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि गुंडों ने उन्हें जान से मारने की धमकी दी, जिससे उनकी सुरक्षा और मानसिक स्थिति दोनों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
तहरीर में यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार घटना के दौरान उनके साथ बर्बरता की गई। जब पत्रकार ने अपने काम के संदर्भ में कुछ संवेदनशील मुद्दों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया, तो गुंडों ने प्रतिक्रिया स्वरूप उनके खिलाफ हिंसा का सहारा लिया। यह स्थिति न केवल उनके लिए, बल्कि पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत अन्य महिलाओं के लिए भी गंभीर खतरा प्रस्तुत करती है। सिद्धांततः, पत्रकारिता का उद्देश्य समाज को सूचित करना होता है, लेकिन इस प्रकार के हिंसक व्यवहार से स्पष्ट है कि कुछ तत्व अपनी स्वार्थी इच्छाओं के लिए पत्रकारों को निशाना बना रहे हैं।
साथ ही, यह आरोप भी लगाया गया है कि घटना के बाद पुलिस ने उचित कार्रवाई नहीं की। महिला पत्रकार ने अपनी तहरीर में संकेत दिया कि पुलिस की लापरवाही ने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया है। इसके परिणामस्वरूप, न केवल एक व्यक्ति को, बल्कि पूरे समुदाय को सुरक्षा का संकट महसूस होता है। ऐसे मामलों में, जहां पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है, वह लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। इस प्रकार की घटनाएं न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं, बल्कि समाज में चेतना और न्याय के प्रति अविश्वास को भी बढ़ावा देती हैं।
पुलिस की लापरवाही
लखनऊ में महिला पत्रकार के साथ हुई मारपीट के मामले में थाना अलीगंज पुलिस की कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं। इस घटना के बाद जब पीड़िता ने पुलिस को अपने साथ हुई हिंसा की रिपोर्ट करने का प्रयास किया, तो पुलिस ने एफआईआर दर्ज करने में आनाकानी की। यह न केवल सही प्रक्रिया के खिलाफ है, बल्कि इसे पुलिस द्वारा अपनी जिम्मेदारियों के प्रति लापरवाही के रूप में देखा जा सकता है। भारतीय कानून के अनुसार, प्रत्येक नागरिक को न्याय प्राप्त करने का अधिकार है, और पुलिस विभाग का दायित्व होता है कि वह इसे सुनिश्चित करे।
स्थानीय निवासियों की प्रतिक्रिया इस घटना के प्रति नकारात्मक रही है। कई लोगों ने आरोप लगाया है कि पुलिस कार्रवाई में जो सुस्ती दिखाई गई, उस कारण से महिलाएं असुरक्षित महसूस कर रही हैं। लोग यह कह रहे हैं कि ऐसी घटनाओं में पुलिस का उचित और त्वरित संज्ञान लेना आवश्यक है। अगर पुलिस मामले को गंभीरता से लेती, तो पीड़िता और अन्य महिलाओं को सुरक्षा का अनुभव होता। कई स्थानीय लोगों ने पुलिस की निष्क्रियता पर आक्रोश व्यक्त किया है और यह स्पष्ट किया है कि अगर इस तरह की घटनाओं पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसका परिणाम केवल अपराधियों को और बढ़ावा देना होगा।
इस मामले में सोशल मीडिया पर भी कई प्रतिक्रियाएँ आई हैं, जिनमें लोगों ने पुलिस की लापरवाही पर चिंता व्यक्त की है। उनके मुताबिक, ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति इस बात का संकेत है कि पुलिस प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। महिलाएं जब सुरक्षा की खोज करती हैं, तो उन्हें न्याय और सहायता मिलनी चाहिए। क्षेत्र में प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता और प्रभावी कार्रवाई की तत्काल आवश्यकता है ताकि ऐसी घटनाएँ पुनः न हों।
महिला पत्रकार की सुरक्षा की मांग
लखनऊ में महिला पत्रकार ज्योति श्रीवास्तव द्वारा हाल ही में डीसीपी उत्तर से की गई सुरक्षा की मांग एक महत्वपूर्ण विषय है। यह घटना इस बात की पालना करती है कि महिला पत्रकारों के प्रति हमले और उनकी सुरक्षा का मुद्दा बेहद गंभीर हो चुका है। पत्रकारिता का कार्य हमेशा जोखिम भरा होता है, और जब एक पत्रकार महिला होती है, तो उसे और भी अधिक असुरक्षा का सामना करना पड़ता है। इस संदर्भ में, ज्योति श्रीवास्तव ने अपने अनुभवों के आधार पर सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की आवश्यकता पर बल दिया है।
महिला पत्रकारों के साथ इस प्रकार की घटनाएँ केवल व्यक्तिगत सुरक्षा का मामला नहीं हैं, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक समस्या है। जब पत्रकार, जो समाज का दर्पण होते हैं, को हिंसा और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है, तो यह पत्रकारिता की स्वतंत्रता और सत्य की खोज पर प्रश्न चिह्न लगाता है। इसलिए, जरूरी है कि पुलिस प्रशासन और सरकारी निकाय इस मुद्दे पर संजीदगी से विचार करें। श्रीवास्तव ने डीसीपी उत्तर से स्पष्ट रूप से अनुरोध किया कि महिला पत्रकारों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाए, ताकि वे निर्भीक होकर अपने कार्य को अंजाम दे सकें।
महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा और असुरक्षा के चलते महिलाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए सख्त कानूनी प्रावधानों और प्रभावी कार्रवाई की आवश्यकता है। इसके साथ ही, समाज में जागरूकता फैलाने के लिए कार्यक्रमों का आयोजन किया जाना चाहिए, ताकि लोग इस मुद्दे की गंभीरता को समझ सकें। महिला पत्रकारों को समर्थन देने हेतु पत्रकारिता संघों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन को एकजुट होकर काम करने की दिशा में कदम उठाने चाहिए। इस प्रकार की एकता से न केवल महिला पत्रकारों की सुरक्षा को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि यह समाज में महिलाओं के प्रति सकारात्मक बदलाव भी लाएगा।
