पुरवा-उन्नाव: सरकार एक तरफ देश को 5G की रफ़्तार से जोड़ने का दावा कर रही है, वहीं उन्नाव जिले का प्रसिद्ध गांव पासाखेड़ा (मिनी विलायत) आज के दौर में भी ‘नेटवर्क के अंधकार’ में डूबा हुआ है। यहाँ के ग्रामीण मोबाइल फोन तो हाथ में लिए हैं, लेकिन सिग्नल के लिए उन्हें ऊँची छतों और पेड़ों का सहारा लेना पड़ रहा है।
सफेद हाथी साबित हो रहे हैं दिग्गजों के टावर
गांव में BSNL, जियो, एयरटेल और वोडाफोन जैसी दिग्गज कंपनियों के टावर तो शान से खड़े हैं, लेकिन हकीकत में ये सिर्फ लोहे के ऊँचे ढांचे (सफेद हाथी) बनकर रह गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि इन टावरों से नेटवर्क कम और उपभोक्ताओं का सिरदर्द ज्यादा निकलता है।
“BSNL तो पहले ही बदहाली का शिकार था, लेकिन अब निजी कंपनियों ने भी लूट मचा रखी है। रीचार्ज के दाम आसमान छू रहे हैं और सर्विस पाताल में है।” — स्थानीय निवासी
शिक्षा और संचार पर ‘डिजिटल ग्रहण’
इस नेटवर्क की बदहाली ने सबसे ज्यादा नुकसान छात्रों का किया है। ऑनलाइन क्लास और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए इंटरनेट ‘बफरिंग का चक्रव्यूह’ बन चुका है। पासाखेड़ा की वर्तमान स्थिति कुछ इस प्रकार है:
- कॉल ड्रॉप की समस्या: बात शुरू होते ही फोन कट जाता है।
- स्विच ऑफ का मायाजाल: फोन चालू होने के बावजूद बाहर से आने वाली कॉल पर ‘स्विच ऑफ’ सुनाई देता है।
- अपनों से दूरी: वीडियो कॉल तो दूर, लोग अपनों की आवाज सुनने को भी तरस रहे हैं।
आर-पार की जंग: ग्रामीणों ने दी चेतावनी
विभाग के उच्चाधिकारियों की ‘कुंभकर्णी नींद’ और कंपनियों की मनमानी के खिलाफ अब पासाखेड़ा की जनता लामबंद हो चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि वे केवल रीचार्ज के पैसे भरने वाली मशीन नहीं हैं।
बड़ी चेतावनी: ग्रामीणों ने प्रशासन और टेलिकॉम कंपनियों को दो टूक लहजे में चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही नेटवर्क की स्थिति नहीं सुधरी, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र प्रदर्शन करेंगे और विभाग के दरवाजों पर ‘हल्ला बोल’ करेंगे।
अब सवाल यह उठता है कि प्रशासन इस ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ पर कब संज्ञान लेता है? क्या पासाखेड़ा को उसका हक मिलेगा या यहाँ के लोग ऐसे ही नेटवर्क की भीख मांगते रहेंगे?
रिपोर्ट: ब्यूरो डेस्क,
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