उन्नाव। उत्तर प्रदेश के उन्नाव जिले की भौगोलिक संरचना में कभी ‘जीवनरेखा’ का दर्जा रखने वाली लोन नदी आज अपने अस्तित्व की सबसे करुण लड़ाई लड़ रही है। पुरवा-अचलगंज मार्ग के किनारे बहने वाली यह नदी अब जल का स्रोत नहीं, बल्कि काले जहर का एक खुला नाला बन चुकी है। यह केवल एक नदी का प्रदूषण नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता, कृषि और जनस्वास्थ्य पर मंडराता हुआ वह ‘साइलेंट किलर’ है, जिसे औद्योगिक इकाइयों ने अपने मुनाफे की भेंट चढ़ा दिया है।
टेनरियों का ‘काला सच’ और मरती नदी
लोन नदी के इस विनाश के पीछे कानपुर और उन्नाव औद्योगिक क्षेत्र की टेनरियां और स्लॉटर हाउस मुख्य अपराधी बनकर उभरे हैं। स्थानीय निवासियों का आरोप है कि ये इकाइयां रात के अंधेरे में या गुपचुप तरीके से अपना घातक रासायनिक कचरा और बिना ट्रीटमेंट किया हुआ (Untreated) पानी सीधे नदी में प्रवाहित कर रही हैं।
यह पानी न केवल काला है, बल्कि इसमें मौजूद भारी धातुएं (Heavy Metals) जैसे क्रोमियम, लेड और आर्सेनिक जल के पारिस्थितिकी तंत्र को पूरी तरह नष्ट कर चुके हैं। नदी में अब जलीय जीवन का नामो-निशान नहीं बचा है; मछलियां मर चुकी हैं और पानी इतना तेजाबी हो चुका है कि इसकी गंध दूर-दूर तक हवा में जहर घोल रही है।
पाताल तक पहुंचा जहर: जलस्तर और स्वास्थ्य पर प्रहार
लोन नदी की त्रासदी केवल उसकी सतह तक सीमित नहीं है। विशेषज्ञों का कहना है कि नदी के तल में जमा जहरीले रसायन अब रिसकर भूजल (Groundwater) में मिल रहे हैं। इसका नतीजा यह है कि नदी किनारे बसे दर्जनों गांवों के हैंडपंपों और कुओं ने भी अब पीला और बदबूदार पानी उगलना शुरू कर दिया है।
- बीमारियों का अंबार: ग्रामीणों में त्वचा रोग (Skin Diseases), चर्म कैंसर, गुर्दे की बीमारियां और पेट के गंभीर संक्रमण आम हो गए हैं। छोटे बच्चे और बुजुर्ग इसकी पहली चपेट में आ रहे हैं।
- अपंग होती खेती: किसान बेबस हैं। सिंचाई के लिए दूसरा कोई विकल्प न होने के कारण वे इसी जहरीले पानी का उपयोग करने को मजबूर हैं। इसका परिणाम यह है कि उपजाऊ जमीन अब ‘ऊसर’ में तब्दील हो रही है और फसलों में भी रसायनों के अंश पाए जा रहे हैं, जो अंततः मानव आहार श्रृंखला (Food Chain) का हिस्सा बन रहे हैं।
सियासी सन्नाटा और संगठनों की ‘सुविधाजनक’ चुप्पी
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुखद पहलू जनप्रतिनिधियों और तथाकथित सामाजिक संगठनों की भूमिका है। जिले में किसान यूनियन और समाजसेवा के नाम पर कुकुरमुत्ते की तरह उगे संगठनों की कमी नहीं है, लेकिन जब बात लोन नदी को बचाने की आती है, तो सभी ने ‘सुविधाजनक चुप्पी’ साध रखी है।
”चुनाव के समय बड़े-बड़े वादे करने वाले सांसद और विधायक आज इस मुद्दे पर बात करने से बच रहे हैं। क्या ग्रामीणों का वोट केवल आश्वासन के लिए है? आखिर औद्योगिक घरानों के दबाव में जनता की सेहत को क्यों दांव पर लगाया जा रहा है?”
— स्थानीय ग्रामीण
हैरानी की बात यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (UPPCB) के अधिकारी भी कागजी कार्रवाई और ‘सब ठीक है’ के दावों के पीछे छिपे हुए हैं। प्रशासन की यह सुस्ती साफ इशारा करती है कि या तो वे स्थिति की गंभीरता को समझ नहीं रहे, या फिर वे जानबूझकर आंखें मूंदे बैठे हैं।
क्या है समाधान? विशेषज्ञों की राय
पर्यावरणविदों का मानना है कि लोन नदी को बचाने के लिए अब केवल सफाई अभियान काफी नहीं है। इसके लिए कड़े कानूनी और तकनीकी कदम उठाने होंगे:
- जीरो लिक्विड डिस्चार्ज (ZLD): टेनरियों के लिए अनिवार्य किया जाए कि एक बूंद गंदा पानी भी बाहर न निकले।
- CETP की निगरानी: कॉमन एफ्लुएंट ट्रीटमेंट प्लांट की रीयल-टाइम मॉनिटरिंग हो और धांधली करने वाली इकाइयों के लाइसेंस रद्द हों।
- नदी का पुनरुद्धार: नदी की ड्रेजिंग की जाए ताकि तलहटी में जमा रसायनों को हटाया जा सके।
वक्त हाथ से निकल रहा है
लोन नदी की बदहाली केवल उन्नाव की समस्या नहीं है, यह आने वाले एक बड़े पर्यावरणीय शरणार्थी (Environmental Refugees) संकट की आहट है। यदि आज जिम्मेदार अधिकारी और नेता अपनी कुंभकर्णी नींद से नहीं जागे, तो वह दिन दूर नहीं जब इस क्षेत्र का भूजल पूरी तरह ‘अमर जहरीला’ हो जाएगा और आने वाली पीढ़ियां केवल बीमारियों की विरासत ढोएंगी।
अब समय दावों का नहीं, धरातल पर कार्रवाई का है। क्या प्रशासन इस जहर को रोकने का साहस जुटा पाएगा? यह सवाल आज उन्नाव का हर नागरिक पूछ रहा है।
