प्रयागराज। प्रदेश में पंचायत चुनावों में देरी और ग्राम प्रधानों के कार्यकाल को बढ़ाने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि पंचायतों का कार्यकाल संविधान और कानून के तहत पांच वर्ष के लिए निर्धारित है तथा किसी भी स्थिति में कार्यकाल समाप्त होने से पहले नए चुनाव कराए जाने चाहिए।
यह टिप्पणी न्यायमूर्ति सिद्धार्थ नंदन की एकलपीठ ने अरविंद राठौर द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान की। अदालत ने राज्य सरकार को मामले में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश देते हुए चुनाव टालने के कारणों और कानूनी आधार का स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करने को कहा है।
याचिका में राज्य सरकार द्वारा 25 और 26 मई 2026 को जारी किए गए आदेशों को चुनौती दी गई है। इन आदेशों में उत्तर प्रदेश पंचायत राज अधिनियम, 1947 की धारा 12(3-ए) का हवाला देते हुए पंचायत चुनाव स्थगित किए गए थे। साथ ही, मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति दी गई थी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि पंचायतों का नियमित और समयबद्ध चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। संविधान के अनुरूप पंचायतों का कार्यकाल पांच वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और चुनाव प्रक्रिया समय पर पूरी कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।
कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि यदि चुनाव समय पर नहीं कराए जाते हैं, तो इसके लिए सरकार को उचित और ठोस कानूनी कारण बताने होंगे। अब राज्य सरकार को विस्तृत हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करना होगा कि किन परिस्थितियों में चुनाव स्थगित किए गए और प्रधानों को प्रशासक के रूप में कार्य जारी रखने की अनुमति क्यों दी गई।
मामले की अगली सुनवाई में हाईकोर्ट सरकार के जवाब पर विचार करेगा। पंचायत चुनावों में देरी का यह मामला प्रदेश की लाखों ग्रामीण आबादी और स्थानीय स्वशासन व्यवस्था से जुड़ा होने के कारण महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Source -pbshbd
