वॉशिंगटन/नई दिल्ली। भारत और अमेरिका के बीच बहुप्रतीक्षित व्यापार समझौते (Trade Deal) को लेकर एक चौंकाने वाला बयान सामने आया है। अमेरिका के वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लुटनिक ने आरोप लगाया है कि यह समझौता इसलिए अटका हुआ है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फोन नहीं किया। लुटनिक ने यह बड़ा दावा एक मशहूर पॉडकास्ट के दौरान किया, जिससे दोनों देशों के व्यापारिक गलियारों में हलचल मच गई है।
“यह ट्रंप का समझौता है, मोदी को बात करनी होगी”
’ऑल-इन पॉडकास्ट’ में बातचीत करते हुए हॉवर्ड लुटनिक ने साफ शब्दों में कहा कि अंतिम निर्णय राष्ट्रपति ट्रंप को ही लेना है। उन्होंने कहा:
”स्पष्ट कर दूं, यह उनका (ट्रंप का) समझौता है। वह अंतिम निर्णय लेने वाले हैं। मैंने कहा था कि आपको मोदी से बात करनी होगी… वे (भारतीय पक्ष) ऐसा करने में असहज थे। अंततः मोदी ने फोन नहीं किया।”
रूसी तेल पर 500% टैरिफ का खतरा
लुटनिक का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर 500% तक टैरिफ लगाने का विधेयक पारित किया है। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने स्पष्ट किया है कि इस कदम का उद्देश्य भारत, चीन और ब्राजील जैसे देशों पर दबाव बनाना है ताकि वे रूस से तेल खरीदना बंद करें।
भारतीय उत्पादों पर 50% तक पहुंचा टैक्स
रूस के साथ व्यापारिक रिश्तों के कारण भारत को पहले ही भारी आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ रहा है।
- अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारतीय आयातों पर अतिरिक्त टैरिफ लगाए थे।
- वर्तमान में भारतीय उत्पादों पर कुल टैरिफ 50% तक पहुंच गया है (25% अतिरिक्त और 25% प्रतिशोधी टैरिफ)।
- अमेरिका का आरोप है कि भारत द्वारा रूसी तेल की खरीद यूक्रेन युद्ध में रूस की मदद कर रही है।
$500 बिलियन व्यापार का लक्ष्य और चुनौतियां
तनाव के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापारिक वार्ता जारी है।
- लक्ष्य: 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $191 बिलियन से बढ़ाकर $500 बिलियन से अधिक करना।
- वर्तमान स्थिति: 2024-25 में अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार रहा है ($131.84 बिलियन का व्यापार)।
- डेडलाइन: फरवरी में दोनों देशों के नेताओं ने 2025 की सर्दियों तक पहले चरण के समझौते का लक्ष्य रखा था।
निष्कर्ष
अमेरिकी मंत्री का यह बयान कि “एक फोन कॉल की कमी” से डील अटकी है, दिखाता है कि यह समझौता अब केवल आर्थिक नहीं बल्कि अत्यधिक राजनीतिक हो चुका है। अब देखना यह है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता (रूस के साथ रिश्ते) को बरकरार रखते हुए अमेरिका के साथ इस ऐतिहासिक डील को अंतिम रूप दे पाता है या नहीं।
