नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक और मानवीय फैसला सुनाते हुए 1992 के एक आपराधिक मामले में दोषी पाए गए 80 वर्षीय बुजुर्ग की सजा को कम कर दिया है। जस्टिस के विनोद चंद्रन और जस्टिस एन वी अंजारिया की खंडपीठ ने कहा कि चूंकि दोषी अपनी ‘जिंदगी के दिसंबर’ (अंतिम पड़ाव) में है, इसलिए इस उम्र में उसे वापस जेल भेजना उचित और न्यायसंगत नहीं होगा।
“अदालतों को बेपरवाह नहीं होना चाहिए”
सुप्रीम कोर्ट ने दोषी की सजा को बरकरार रखते हुए उसे उतना ही कर दिया है, जितना वह पहले ही जेल में बिता चुका है। बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“अदालतों को न्यायिक प्रक्रियाओं के दौरान मानवीय परिस्थितियों के प्रति बेपरवाह या असंवेदनशील नहीं होना चाहिए। अपीलकर्ता की अत्यधिक उम्र और मामले के तथ्यों को देखते हुए यह बदलाव आवश्यक है।”
क्या था पूरा मामला?
यह मामला दिसंबर 1992 का है, जब मध्य प्रदेश में एक झगड़े के दौरान हुए हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
- ट्रायल कोर्ट का फैसला: 1997 में निचली अदालत ने बुजुर्ग को हत्या (IPC 302) का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।
- हाईकोर्ट का रुख: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने सजा को हत्या से बदलकर ‘गैर-इरादतन हत्या’ (IPC 304 Part-II) कर दिया था और सात साल की जेल तय की थी।
- सुप्रीम कोर्ट की राहत: बुजुर्ग अब तक कुल 6 साल और 3 महीने जेल में बिता चुका था। शीर्ष अदालत ने उसकी वर्तमान उम्र (80+ वर्ष) को देखते हुए इसी अवधि को पूर्ण सजा मान लिया।
सजा में बदलाव का आधार
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के उस तर्क को सही माना कि घटना के समय हमलावरों का मकसद हत्या करना नहीं था, बल्कि वह अचानक हुए झगड़े का परिणाम था। कोर्ट ने दोषी की व्यक्तिगत भूमिका का आकलन करने के बाद पाया कि वह पहले ही सजा का एक बड़ा हिस्सा काट चुका है।
33 साल पुराने मामले का पटाक्षेप
बता दें कि दोषी को पहली बार 1992 में गिरफ्तार किया गया था। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद 1998 में उसे जमानत मिली थी, फिर 2010 में उसने सरेंडर किया और 2011 से वह फिर जमानत पर था। अब सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद उसे वापस सलाखों के पीछे नहीं जाना पड़ेगा।
