नई दिल्ली |भारत के गणतंत्र दिवस 2026 की परेड इस बार बेहद खास होने वाली है। राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की रचना के 150 गौरवशाली वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में संस्कृति मंत्रालय एक विशेष झांकी प्रस्तुत करेगा। यह झांकी न केवल गीत के इतिहास को दर्शाएगी, बल्कि इसे भारत की सामूहिक चेतना और सांस्कृतिक निरंतरता के प्रतीक के रूप में पेश करेगी।
सभ्यतागत स्मृति का जीवंत अभिलेख
संस्कृति मंत्रालय के सचिव श्री विवेक अग्रवाल ने इस थीम की जानकारी साझा करते हुए कहा कि गणतंत्र दिवस की झांकियां केवल एक औपचारिक प्रदर्शन नहीं, बल्कि राष्ट्र की सभ्यतागत स्मृति के ‘चलते-फिरते अभिलेख’ हैं। उन्होंने बताया कि वंदे मातरम् वह मंत्र है जिसने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भक्ति को साहस में और कविता को संकल्प में बदल दिया था।
झांकी का आकर्षण: अतीत और भविष्य का संगम
इस वर्ष की झांकी को आधुनिक और ऐतिहासिक तत्वों के मेल से तैयार किया गया है:
- मूल पांडुलिपि: झांकी के मुख्य भाग (ट्रैक्टर) पर बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित ‘वंदे मातरम्’ की मूल पांडुलिपि प्रदर्शित की जाएगी।
- कलात्मक प्रतिरोध की गाथा: झांकी में विष्णुपंत पगनिस द्वारा राग सारंग में गाए गए उस ऐतिहासिक संस्करण को भी महत्व दिया गया है, जिसे औपनिवेशिक सेंसरशिप से बचने के लिए खास तरीके से तैयार किया गया था।
- जेन-जी और लोक कलाकार: झांकी के केंद्र में आज की युवा पीढ़ी (Gen-Z) को इस गीत को गाते हुए दिखाया जाएगा, जो यह संदेश देता है कि यह गीत आज भी प्रासंगिक है। साथ ही, चारों दिशाओं से आए लोक कलाकार भारत की विविधता को प्रदर्शित करेंगे।
IGNCA के कंधों पर जिम्मेदारी
वर्ष 2021 से ही इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) संस्कृति मंत्रालय की झांकी की परिकल्पना और निर्माण का कार्य कर रहा है। IGNCA के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने बताया कि यह झांकी किसी विभाग की उपलब्धि मात्र नहीं है, बल्कि देश की सामूहिक भावनाओं और राष्ट्रीय चेतना की अभिव्यक्ति है। उन्होंने कहा कि जहां अन्य झांकियां कार्यक्रमों पर केंद्रित होती हैं, वहीं संस्कृति मंत्रालय का विजन दार्शनिक और सांस्कृतिक नींव को प्रदर्शित करना है।
वंदे मातरम्: एक गीत से बढ़कर
1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित इस गीत ने भारत को ‘माता’ के रूप में कल्पित किया। श्री अरबिंदो ने भी इसमें वह आध्यात्मिक शक्ति देखी थी जिसने देशवासियों को क्षेत्र, भाषा और धर्म से ऊपर उठकर एकजुट किया।
जब 2026 में यह झांकी कर्तव्य पथ (राजपथ) से गुजरेगी, तो यह देशवासियों को न केवल आजादी की याद दिलाएगी, बल्कि विकसित भारत के निर्माण के लिए भविष्य की जिम्मेदारियों का भी आह्वान करेगी।
