नई दिल्ली। देश की राजधानी में विरोध-प्रदर्शनों के प्रमुख केंद्र जंतर-मंतर को लेकर अब कानूनी और संवैधानिक बहस तेज हो गई है। दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में सवाल उठाया कि आखिर जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में बंद क्यों नहीं कर दिया जाता, जबकि सुप्रीम कोर्ट के समक्ष भी इसे बड़े प्रदर्शनों के लिए अनुपयुक्त बताते हुए वैकल्पिक स्थान तय करने की मांग वाली याचिका विचाराधीन है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है कि जंतर-मंतर बड़े और लंबे समय तक चलने वाले धरना-प्रदर्शनों के लिए पर्याप्त सुविधाओं वाला स्थान नहीं है। याचिकाकर्ता सतीश चंद्र कौशिक की ओर से वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल तय करने की मांग की गई है। याचिका में रामलीला मैदान जैसे बड़े और अधिक व्यवस्थित स्थान को विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करने की बात भी सामने आई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार, दिल्ली सरकार और दिल्ली पुलिस से जवाब मांगा है।
वहीं दिल्ली हाईकोर्ट में एक संगठन की ओर से 10 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति से जुड़ा मामला पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने जंतर-मंतर को प्रदर्शन स्थल के रूप में जारी रखने पर सवाल उठाते हुए पूछा कि इसे बंद क्यों नहीं कर दिया जाता। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि प्रदर्शन में अधिकतम करीब 75 लोग शामिल होंगे। हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस को आवेदन पर 8 अगस्त तक निर्णय लेने का निर्देश दिया।
प्रदर्शन का अधिकार बनाम सार्वजनिक व्यवस्था
जंतर-मंतर को लेकर मौजूदा विवाद का सबसे अहम पहलू नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन है। सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि शांतिपूर्ण और कानून के दायरे में होने वाला विरोध लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। जुलाई में सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि केवल प्रदर्शन होने के कारण पुलिस की ओर से अत्यधिक कार्रवाई नहीं की जा सकती और इस विषय में संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता है।
जंतर-मंतर को लेकर बहस केवल प्रदर्शन की अनुमति तक सीमित नहीं है। हाल के मामलों में प्रदर्शनकारियों की निगरानी, वीडियो रिकॉर्डिंग और चेहरे की पहचान तकनीक के इस्तेमाल को लेकर भी दिल्ली हाईकोर्ट में सवाल उठे हैं। एक याचिका में आरोप लगाया गया कि प्रदर्शनकारियों की लगातार निगरानी उनके निजता, गरिमा और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को प्रभावित कर सकती है।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या जंतर-मंतर को पूरी तरह प्रदर्शन स्थल से हटा दिया जाएगा या फिर प्रदर्शनकारियों की संख्या, प्रदर्शन की अवधि और सुरक्षा व्यवस्था के आधार पर नई व्यवस्था बनाई जाएगी। यदि बड़े प्रदर्शनों के लिए कोई नया और सुविधाजनक स्थान तय किया जाता है तो इससे राजधानी की यातायात व्यवस्था और आसपास के निवासियों को होने वाली परेशानी कम करने में मदद मिल सकती है। दूसरी ओर, प्रदर्शनकारियों के लिए ऐसा स्थान जरूरी होगा जहां उनकी आवाज सत्ता के केंद्र तक प्रभावी ढंग से पहुंच सके।
जंतर-मंतर लंबे समय से देश में लोकतांत्रिक विरोध की पहचान रहा है। ऐसे में इस स्थल के भविष्य का फैसला केवल प्रशासनिक व्यवस्था का विषय नहीं होगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि राजधानी में नागरिकों के विरोध के अधिकार और सार्वजनिक सुविधा के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाता है। फिलहाल निगाहें सुप्रीम कोर्ट में चल रही कार्यवाही और सरकार के जवाब पर टिकी हैं।
